छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रदेश में जबरन और प्रलोभन देकर कराए जाने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए नया कानून ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ विधानसभा के पटल पर रख दिया है। गृह मंत्री और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा द्वारा पेश किए गए इस विधेयक में दोषियों के लिए कड़ी सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया है। यह नया कानून 1968 के पुराने अधिनियम की जगह लेगा।
विधेयक की 5 सबसे बड़ी और खास बातें:
1.आजीवन कारावास की सजा: सामूहिक धर्मांतरण (जब एक साथ 2 या अधिक लोगों का धर्म परिवर्तन कराया जाए) के मामलों में कम से कम 10 साल की सजा, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। साथ ही ₹25 लाख तक का जुर्माना भी देना होगा।
2.महिलाओं और नाबालिगों के लिए सख्त नियम: यदि धर्मांतरण किसी नाबालिग, महिला या SC/ST वर्ग के व्यक्ति का कराया जाता है, तो दोषी को 10 से 20 साल तक की जेल और कम से कम ₹10 लाख का जुर्माना भुगतना होगा।
3.पहले देनी होगी सूचना: अब धर्म परिवर्तन करने से कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) को घोषणा पत्र देना अनिवार्य होगा। धर्म परिवर्तन कराने वाले धार्मिक व्यक्ति (पुजारी, पादरी आदि) को भी इसकी सूचना प्रशासन को देनी होगी।
4.सिर्फ शादी के लिए धर्मांतरण अवैध: यदि कोई विवाह केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किया जाता है, तो उस विवाह को अमान्य (Invalid) घोषित कर दिया जाएगा।
5.विशेष अदालतों में सुनवाई: इन मामलों की गंभीरता को देखते हुए इनकी सुनवाई के लिए विशेष अदालतों (Special Courts) का गठन किया जाएगा। जांच की जिम्मेदारी सब-इंस्पेक्टर (SI) से ऊपर के रैंक के अधिकारियों की होगी।
धर्मांतरण अब होगा ‘संज्ञेय’ और ‘गैर-जमानती’ अपराध
नए कानून के तहत अवैध धर्मांतरण को संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-Bailable) अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इसका अर्थ है कि पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तारी कर सकेगी और आरोपियों को आसानी से जमानत नहीं मिलेगी।
कठोर दंडात्मक प्रावधान (जेल और जुर्माना)
विधेयक में अपराध की गंभीरता के आधार पर सजा को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है:
विधेयक की मुख्य विशेषताएं और नए नियम
डिजिटल माध्यम पर रोक: अब केवल भौतिक रूप से ही नहीं, बल्कि डिजिटल माध्यमों से महिमामंडन, दबाव या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन का प्रयास करना भी अपराध माना जाएगा।
‘घर वापसी’ को छूट: विधेयक में स्पष्ट किया गया है कि अपने मूल या पैतृक धर्म में पुनः वापसी को धर्मांतरण की श्रेणी में नहीं माना जाएगा।
त्वरित न्याय के लिए विशेष अदालतें: प्रत्येक जिले में ‘विशेष न्यायालय’ का गठन किया जाएगा ताकि इन मामलों की सुनवाई तेजी से हो सके।
पीड़ितों को मुआवजा: दोषियों को न केवल सजा मिलेगी, बल्कि उन्हें पीड़ित व्यक्ति को आर्थिक मुआवजा (प्रतिकर) भी देना होगा।
विशेष लोक अभियोजक: पीड़ितों का पक्ष मजबूती से रखने के लिए विशेष लोक अभियोजकों की नियुक्ति की जाएगी।
किसे माना जाएगा ‘अवैध’ प्रयास?
विधेयक के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति धन, उपहार, नौकरी, मुफ्त शिक्षा/स्वास्थ्य, विवाह का वादा या बेहतर जीवनशैली का लालच देकर, अथवा मनोवैज्ञानिक दबाव और भय दिखाकर धर्म परिवर्तन कराता है, तो वह कानून के दायरे में आएगा।
सरकार का मानना है कि इस कानून से छत्तीसगढ़ की धर्म-संस्कृति का सम्मान सुरक्षित रहेगा और सुशासन के संकल्प के साथ अवैध गतिविधियों पर लगाम लगेगी।
क्यों पड़ी इस कानून की जरूरत?
सरकार का कहना है कि प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों, विशेषकर बस्तर और सरगुजा में ‘चंगाई सभाओं’ और प्रलोभन के माध्यम से धर्मांतरण की शिकायतें लगातार बढ़ रही थीं। पुराने कानून में सजा के प्रावधान कमजोर थे, जिससे अपराधियों में डर नहीं था। नया विधेयक इसे रोकने के लिए यूपी और एमपी के कानूनों से भी अधिक सख्त बनाया गया है।
“सच का आइना की पड़ताल: इस नए विधेयक के साथ छत्तीसगढ़ अब उन चुनिंदा राज्यों की सूची में शीर्ष पर है, जहाँ अवैध धर्मांतरण के खिलाफ देश के सबसे कड़े कानून लागू किए गए हैं।”