राजस्थान के सीकर जिले में स्थित ‘शीश के दानी’ बाबा खाटू श्याम का विश्व प्रसिद्ध फाल्गुन लक्खी मेला आज से पूरी भव्यता के साथ प्रारंभ हो गया है। देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु ‘जय श्री श्याम’ के जयकारों के साथ खाटू धाम पहुँच रहे हैं। कलयुग के अवतारी माने जाने वाले बाबा श्याम के इस मेले में सुरक्षा और सुविधा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। मान्यता है कि जो कहीं से हार जाता है, उसे बाबा श्याम का सहारा मिलता है।
महाभारत काल से जुड़ा है इतिहास
खाटू श्याम जी असल में भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक हैं। महाभारत युद्ध के समय उन्होंने अपनी माता को वचन दिया था कि वह ‘हारे हुए पक्ष’ की ओर से लड़ेंगे। भगवान श्री कृष्ण ने उनके इस अपार बल और दानवीरता को देखकर उनसे उनका शीश मांग लिया था। बर्बरीक ने हंसते-हंसते अपना शीश दान कर दिया, जिससे प्रसन्न होकर कृष्ण ने उन्हें अपना नाम ‘श्याम’ दिया और कलयुग में पूजे जाने का वरदान दिया।
खाटू श्याम मंदिर के 7 सबसे रोचक और गहरे रहस्य
शीश का प्रकट होना: मान्यताओं के अनुसार, कलयुग की शुरुआत में खाटू गांव में एक गाय के थनों से अपने आप दूध बहने लगा था। जब उस जगह की खुदाई हुई, तो वहां से बाबा श्याम का शीश प्रकट हुआ, जिसे राजा रूपसिंह ने मंदिर बनवाकर स्थापित किया।
अजेय तीन बाण: बर्बरीक के पास केवल तीन बाण थे। भगवान कृष्ण ने जब उनकी परीक्षा ली, तो बर्बरीक ने एक ही बाण से पीपल के पेड़ के हर पत्ते में छेद कर दिया था। ये तीन बाण पूरी सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते थे।
श्याम कुंड का चमत्कार: मंदिर के पास स्थित श्याम कुंड के बारे में कहा जाता है कि यहीं बाबा का शीश प्रकट हुआ था। फाल्गुन मेले के दौरान इस कुंड में स्नान करने से चर्म रोग और कई बीमारियां दूर हो जाती हैं।
हारे का सहारा: दुनिया में शायद ही कोई ऐसा मंदिर हो जहां भक्त खुद को ‘हारा हुआ’ मानकर आते हैं। बाबा श्याम को ‘हारे का सहारा’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने कमजोर पक्ष का साथ देने का वचन दिया था।
बदलते स्वरूप का श्रृंगार: भक्तों का मानना है कि बाबा श्याम के विग्रह (मूर्ति) के मुख के भाव दिन में कई बार बदलते हैं। कभी वे बालक जैसे दिखते हैं, तो कभी युवा और कभी अत्यंत ओजस्वी।
बिना धड़ की पूजा: पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा प्रमुख मंदिर है जहाँ केवल ‘शीश’ (Head) की पूजा होती है, धड़ की नहीं। इनका धड़ हरियाणा के ‘हिसार’ (वीर बर्बरीक स्थान) में होने की मान्यता है।
निशान यात्रा का महत्व: फाल्गुन मेले में भक्त मीलों पैदल चलकर ‘निशान’ (विजय का प्रतीक झंडा) लेकर आते हैं। कहा जाता है कि यह निशान बाबा के चरणों में अर्पित करने से जीवन की सभी बाधाएं खत्म हो जाती हैं।
प्रशासन की तैयारी और भक्तों की भीड़
इस बार मेले में भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए करीब 5000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं। रिंगस से खाटू तक की 17 किमी की पदयात्रा को सुगम बनाया गया है। भक्तों के लिए ठंडे पानी, चिकित्सा और विश्राम की निःशुल्क व्यवस्था की गई है।
FAQ: भक्तों के काम की जानकारी
1.सवाल: मुख्य मेला कब है?
जवाब: मेला आज से शुरू हो गया है, लेकिन मुख्य उत्सव फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी (आमलकी एकादशी) को होगा।
2.सवाल: यहाँ पहुँचने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
जवाब: नजदीकी रेलवे स्टेशन रिंगस (Ringas) है, जहाँ से टैक्सी या पैदल खाटू पहुँचा जा सकता है।