
बालोद: लगातार घटते भू-जल स्तर और गर्मी के मौसम में पानी की बढ़ती चुनौती के बीच बालोद वन विभाग ने जल संरक्षण की दिशा में एक अभिनव और प्रेरणादायी पहल शुरू की है। “जल संचय जन भागीदारी अभियान” एवं “नीर चेतना अभियान” के अंतर्गत वन विभाग द्वारा जिलेभर में “बोरी बंधान” तैयार कर वर्षा जल को सहेजने का कार्य किया जा रहा है। खास बात यह है कि इस अभियान में बेकार और अनुपयोगी बोरियों का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण और जल संरक्षण दोनों उद्देश्यों को एक साथ साधा जा रहा है। गुरुवार शाम करीब 5 बजे बालोद परिक्षेत्र अंतर्गत बालोद-दल्ली मार्ग पर दईहान मोड़ के पहले स्थित शिव मंदिर के पास वन कक्ष क्रमांक आरएफ-96, रामनगर बीट में डीएफओ अभिषेक अग्रवाल की मौजूदगी में बोरी बंधान कार्य किया गया। इस दौरान जिला प्रेस क्लब के सदस्यों ने भी अभियान में श्रमदान कर अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। इस दौरान डीएफओ अभिषेक अग्रवाल, एसडीओ किशोरी साहू, रेंजर सरोज सिदार, स्थानीय बीटगार्ड हेमचंद ध्रुव, हरीशचंद्र ठाकुर, जिला प्रेस क्लब अध्यक्ष संतोष साहू, रवि भूतड़ा, विकास साहू, अफजल रिजवी, संजय दुबे, जागेश्वर सिन्हा, घनाराम साहू, प्रवीण सारडा और नरेश श्रीवास्तव सहित अन्य मौजूद रहे।
क्या है बोरी बंधान मॉडल..?-
वन विभाग द्वारा पुराने और अनुपयोगी बोरों में मिट्टी और मुरुम भरकर छोटे-छोटे नालों और जल धाराओं में अवरोध तैयार किए जा रहे हैं। इन अस्थायी बंधानों से बारिश के पानी का तेज बहाव रुकता है और पानी धीरे-धीरे जमीन में समाहित होता है। इससे मिट्टी का कटाव कम होने के साथ भू-जल स्तर सुधारने में मदद मिलती है। विशेषज्ञों के अनुसार यह मॉडल कम लागत वाला, पर्यावरण अनुकूल और ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद कारगर साबित हो सकता है। जहां बड़े जल संरचनाओं के लिए भारी बजट और समय की आवश्यकता होती है, वहीं बोरी बंधान कम संसाधनों में त्वरित परिणाम देने वाला विकल्प बनकर सामने आया है।
600 से ज्यादा बंधान बनाकर लक्ष्य पार-
वन विभाग ने प्रारंभिक चरण में जिलेभर में 500 बोरी बंधान बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया था, लेकिन अभियान को मिल रहे उत्साह और सकारात्मक परिणामों के चलते विभाग अब तक 600 से अधिक बोरी बंधान तैयार कर चुका है। यह कार्य बालोद, डौंडी, डौंडीलोहारा, दल्लीराजहरा और गुरुर वन परिक्षेत्रों में तेजी से जारी है। वन अधिकारियों का कहना है कि इन बंधानों से आसपास के क्षेत्रों में मिट्टी की नमी बढ़ रही है, जिससे प्राकृतिक रूप से पौधों का पुनर्जनन बेहतर हो रहा है और हरियाली को भी बढ़ावा मिल रहा है
जनभागीदारी से जल संरक्षण का संदेश-
अभियान का मुख्य उद्देश्य केवल जल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि आम लोगों को भी पानी बचाने की मुहिम से जोड़ना है। इसी सोच के तहत विभिन्न सामाजिक संगठनों, ग्रामीणों और प्रेस क्लब की सहभागिता सुनिश्चित की जा रही है। डीएफओ अभिषेक अग्रवाल ने बताया कि शासन के निर्देश और कलेक्टर के मार्गदर्शन में जिले में “नीर चेतना अभियान” चलाया जा रहा है, जिसमें प्रत्येक विभाग को अधिक से अधिक लोगों को जल संरक्षण से जोड़ने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने कहा, “हमारे पास जो वेस्ट बोरियां थीं, उनका सदुपयोग करते हुए मिट्टी और मुरुम भरकर नालों में अवरोध तैयार किए जा रहे हैं। इससे पानी के वेग में कमी आती है, मिट्टी का क्षरण रुकता है और मिट्टी में नमी बनाए रखने की क्षमता बढ़ती है। इसका सीधा फायदा आसपास के जंगलों और वन क्षेत्र के पुनर्जनन को मिलेगा” उन्होंने बताया कि वन विभाग ने जिलेभर में 500 बोरी बंधान का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब तक 600 से अधिक स्थानों पर यह कार्य किया जा चुका है और सभी वन परिक्षेत्रों में अभियान लगातार जारी है।
कम लागत में बड़ा असर-
वन विभाग की यह पहल अब जिले में जल संरक्षण के एक सफल मॉडल के रूप में देखी जा रही है। पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि इसी तरह सामुदायिक भागीदारी के साथ छोटे-छोटे जल संरक्षण उपाय लगातार किए जाएं, तो आने वाले वर्षों में जल संकट की स्थिति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
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