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बालोद नगर पालिका में बड़ा खेल: बिना टेंडर चहेती एजेंसी को 22% महंगी दर पर भुगतान, अफसरों की ‘मौन सहमति’ पर उठे सवाल

​बालोद। जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई पर डाका डालने और नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को रेवड़ी बांटने का एक बेहद गंभीर मामला बालोद नगर पालिका से सामने आया है। चर्चा है कि पिछले एक साल से यहां बिना किसी वैध टेंडर प्रक्रिया के एक खास प्लेसमेंट एजेंसी को नियमों के विरुद्ध जाकर 22% अधिक (महंगी) दर पर करोड़ों रुपये का भुगतान किया जा रहा है। इस पूरे मामले में नगर पालिका के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है, जिनकी ‘मौन सहमति’ और साठगांठ की बू साफ आ रही है।

​क्या है पूरा मामला?

​नियमों के मुताबिक, किसी भी सरकारी निकाय में प्लेसमेंट या अन्य सेवाओं के लिए तय समय सीमा के भीतर पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया अपनानी अनिवार्य है। लेकिन बालोद नगर पालिका में सारे कायदे-कानूनों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। बिना किसी कॉम्पिटिटिव बिडिंग (प्रतिस्पर्धी निविदा) के, एक चहेती एजेंसी को न सिर्फ सेवा विस्तार दिया गया, बल्कि उसे बाजार दर और स्वीकृत बजट से 22% अतिरिक्त राशि का भुगतान भी किया जा रहा है। इसे सीधे तौर पर सरकारी खजाने को चूना लगाने वाला ‘खुला खेल’ कहा जा रहा है।

​सवालों के घेरे में जिम्मेदार: जनता पूछ रही है ये 4 बड़े सवाल

​इस कथित महाघोटाले के उजागर होने के बाद सीधे तौर पर नगर पालिका के शीर्ष अधिकारियों और प्रशासनिक अमले पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं:

​सवाल 1: बिना किसी वैध टेंडर प्रक्रिया के, किसी एक चहेती एजेंसी को साल भर तक लगातार काम करने की अनुमति किसने और क्यों दी? इसके पीछे किसका वरदहस्त है?

​सवाल 2: बाजार दर और स्वीकृत बजट से 22% अधिक की दर पर भुगतान करने का वित्तीय आदेश (Financial Order) किसने जारी किया? किस नियम के तहत इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ को मंजूरी दी गई?

​सवाल 3: क्या इस 22% अतिरिक्त राशि का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़कर सीधे तौर पर जिम्मेदार अफसरों और सफेदपोशों की जेबों में जा रहा है?

​सवाल 4: उच्च स्तर पर बैठे ऑडिट विभाग और जिला प्रशासन के निगरानी दल अब तक इस खुली लूट को पकड़ने में नाकाम क्यों रहे? क्या वे सच में अनजान हैं या जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं?

​भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही जनता की कमाई

​स्थानीय नागरिकों और प्रबुद्ध जनों का कहना है कि यह केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित वित्तीय अनियमितता (Financial Scam) का मामला है। जब शहर के विकास कार्य पैसों की कमी का रोना रोकर अटके रहते हैं, तब एक निजी एजेंसी पर इतनी दरियादिली दिखाना यह साबित करता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।

​बड़ा सवाल: देखना अब यह है कि इस खबर के सामने आने के बाद क्या राज्य शासन और जिला प्रशासन के उच्च अधिकारी मामले का संज्ञान लेकर उच्च स्तरीय जांच बिठाते हैं, या फिर इस “महालूट” पर पर्दा डालने की कोशिश की जाएगी?

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