
इंजी. ताराचंद साहू:
भारत के गाँव सदियों से केवल कृषि के केंद्र नहीं, बल्कि शारीरिक कौशल, सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक जीवंतता के भी सशक्त मंच रहे हैं। जो खेल कभी गाँव की चौपालों, मेलों और खेतों की पगडंडियों तक सीमित थे, वे आज विश्व के खेल मानचित्र पर अपनी धाक जमा रहे हैं। कबड्डी, खो-खो और कैरम जैसे स्वदेशी खेल आज ‘सॉफ्ट पावर’, सांस्कृतिक कूटनीति और समावेशी विकास के वैश्विक उदाहरण बन चुके हैं।
1. कबड्डी: चौपाल से ओलंपिक के गलियारों तक
बिना किसी महंगे उपकरण के खेला जाने वाला कबड्डी, ग्रामीण समाज की सहजता का प्रतीक है। इसकी यात्रा आधुनिक खेल जगत के लिए एक प्रेरणा है:
ऐतिहासिक संदर्भ: संस्कृत साहित्य और पौराणिक कथाओं में शक्ति और रणनीति के इस खेल का उल्लेख मिलता है।
संगठित स्वरूप: 1920 के दशक में पहली बार इसे नियमबद्ध किया गया और 1950 में अखिल भारतीय कबड्डी महासंघ की स्थापना हुई।
वैश्विक पहचान: 1936 के बर्लिन ओलंपिक में इसकी पहली झलक दिखी। 1990 से यह एशियाई खेलों का नियमित हिस्सा है।
वर्तमान स्थिति: आज कबड्डी एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका सहित 50 से अधिक देशों में खेली जाती
2. खो-खो और कैरम: परंपरा और आधुनिकता का संगम
ग्रामीण भारत के ये खेल आज तकनीक और आधुनिक नियमों के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बना चुके हैं।
खो-खो: महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों से निकला यह खेल 1914 में पुणे के डेक्कन जिमखाना क्लब के प्रयासों से चर्चा में आया। वर्ष 2025 में आयोजित पहले खो-खो विश्व कप में 6 महाद्वीपों के 23 देशों की भागीदारी ने इसके वैश्विक विस्तार पर मुहर लगा दी है।
कैरम: 19वीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप में जन्मा यह खेल मनोरंजन से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय महासंघ के गठन तक पहुँचा। आज यह दुनिया भर के क्लबों और घरों का हिस्सा है।
3. पुनर्जीवित होती अन्य स्वदेशी विधाएं
भारत की खेल विरासत में कई ऐसे रत्न हैं जिन्हें अब सरकारी मान्यता और मंच मिल रहा है:
लगोरी: हजारों साल पुरानी जड़ों वाला यह खेल आधुनिक प्रतियोगिताओं के माध्यम से पुनः लोकप्रिय हो रहा है।
आट्या-पाट्या: ग्रामीण क्षेत्रों का यह पारंपरिक खेल अब सरकारी मान्यता प्राप्त खेलों की श्रेणी में है।
सरकार की पहल: ‘खेलो इंडिया’ से ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ तक
भारत सरकार ने इन खेलों के संरक्षण और वैश्वीकरण के लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाए हैं:
योजना/पहल उद्देश्य एवं प्रभाव
खेलो इंडिया जमीनी स्तर पर स्वदेशी प्रतिभा की पहचान और उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान करना।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) विद्यालयों में 75 पारंपरिक खेलों को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना।
संस्थागत सहयोग भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के माध्यम से वित्तीय सहायता और प्रशिक्षण प्रदान करना।
निष्कर्ष: हमारी विरासत, हमारा भविष्य
भारतीय ग्रामीण खेलों की यह यात्रा प्रमाणित करती है कि यदि स्थानीय परंपराओं को संगठित प्रयास और नीतिगत समर्थन मिले, तो वे वैश्विक पहचान बन सकती हैं। कबड्डी और खो-खो जैसे खेल आज केवल खेल नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत के वैश्विक प्रतिनिधि हैं।
”गाँव की मिट्टी में जन्मी ये परंपराएं विश्व मंच पर अपनी स्थाई छाप छोड़ रही हैं। अब समय है कि हम अपनी इन विधाओं को संजोएं ताकि भविष्य की पीढ़ी को अपनी जड़ों पर गर्व हो सके।”
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