बालोद। हजार वर्षों की सनातन आस्था, सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक विरासत के प्रतीक “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व – अटूट आस्था के 1000 वर्ष” के राष्ट्रव्यापी आयोजन से अब बालोद का ऐतिहासिक कपिलेश्वर धाम भी जुड़ने जा रहा है। छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग के निर्देशानुसार 11 मई 2026 को जिले के प्राचीन एवं पुरातात्विक महत्व वाले कपिलेश्वर शिव मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक, सांस्कृतिक एवं भक्तिपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसके साथ ही जिले के विभिन्न शिवालयों में भी भजन, पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी।
कलेक्टर श्रीमती दिव्या उमेश मिश्रा ने बताया कि “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व – अटूट आस्था के 1000 वर्ष” का आयोजन 11 मई 2026 राष्ट्रव्यापी स्मरण उत्सव के रूप में किया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, सनातन परंपरा और धार्मिक चेतना को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है। कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए डिप्टी कलेक्टर श्रीमती प्राची ठाकुर को नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है।
इतिहास, आस्था और स्थापत्य कला का अद्भुत संगम
बालोद नगर के उत्तरी क्षेत्र में स्थित कपिलेश्वर मंदिर समूह जिले की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में गिना जाता है। दल्ली चौक से लगभग दो किलोमीटर दूरी पर स्थित यह प्राचीन मंदिर परिसर छह मंदिरों और एक विशाल कुंड का समूह है। परिसर में शिव मंदिर, दुर्गा मंदिर, राम-जानकी मंदिर, कृष्ण मंदिर, गणेश मंदिर, संतोषी, जगन्नाथ, मंदिर स्थापित हैं, जो मध्यकालीन छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला और सांस्कृतिक समृद्धि का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
इतिहासकारों और पुरातत्वीय अध्ययनों के अनुसार इन मंदिरों का निर्माण स्थानीय नागवंशी शासकों के शासनकाल में लगभग 13वीं से 14वीं शताब्दी के बीच कराया गया माना जाता है। मंदिरों में निर्मित त्रिशाख द्वार, नाग आकृतियां, कमल अलंकरण, लतावल्लरी शिल्प तथा प्रस्तर निर्मित विशाल गणेश प्रतिमाएं उस समय की विकसित कला शैली को दर्शाती हैं।
प्राचीन शिव मंदिर बना आकर्षण का केंद्र
मंदिर समूह का सबसे प्रमुख आकर्षण प्राचीन शिव मंदिर है, जो ऊंची जगती पर निर्मित है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना, द्वारपाल, गणेश प्रतिमा और अलंकृत शिल्पकारी दर्शनीय है। मंदिर के शिखर पर नाग, गज, योद्धा, वृक्ष, पक्षी तथा विभिन्न जीव-जंतुओं की आकृतियां उकेरी गई हैं, जो इसकी स्थापत्य विशेषता को और अधिक समृद्ध बनाती हैं।
शिव मंदिर के सामने स्थित प्राचीन कुंड तथा परिसर में स्थापित विशाल गणेश प्रतिमाएं श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं दोनों के आकर्षण का केंद्र हैं। यहां पंचपांडव, हनुमान, सती स्तंभ, उमामहेश्वर और अन्य दुर्लभ प्रस्तर प्रतिमाएं भी संरक्षित हैं, जो इस स्थल की ऐतिहासिक महत्ता को और अधिक बढ़ाती हैं।
सांस्कृतिक आस्था के साथ पर्यटन की भी बड़ी संभावना
स्थानीय लोगों की गहरी आस्था का केंद्र रहा कपिलेश्वर धाम अब धीरे-धीरे जिले की सांस्कृतिक पहचान बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्राचीन धरोहर का व्यवस्थित संरक्षण, सौंदर्यीकरण और व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए तो यह स्थल राज्य के प्रमुख धार्मिक एवं विरासत पर्यटन केंद्रों में शामिल हो सकता है।
मंदिर परिसर के आसपास स्थित प्राचीन तालाब, पुराने किले जैसी संरचनाएं तथा खुले संग्रहालय में संरक्षित प्राचीन प्रतिमाएं इस क्षेत्र के समृद्ध इतिहास की गवाही देती हैं। यही कारण है कि कपिलेश्वर मंदिर समूह केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि बालोद की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।
राष्ट्रीय स्मरण उत्सव से मिलेगी नई पहचान
11 मई को आयोजित होने वाले कार्यक्रम में जिले के गुरुर ब्लॉक के पलारी एवं बालोद ब्लॉक के जगन्नाथपुर स्थित प्राचीन शिवालयों में भक्तिपूर्ण और सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा। इसके साथ ही विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं शैक्षणिक संस्थाओं में भी सेमीनार, संवाद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के माध्यम से अब बालोद का कपिलेश्वर धाम केवल स्थानीय श्रद्धा का केंद्र नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक गौरव और सनातन परंपरा के प्रतीक के रूप में भी नई पहचान प्राप्त करता दिखाई दे रहा है।