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जज्बे को सलाम: बालोद के दिव्यांग रूपेश ने साइकिल पर पौधे बांटकर रचा इतिहास, 20 साल से नि:स्वार्थ सेवा,

बालोद। कहते हैं कि अगर इरादों में मजबूती हो, तो शारीरिक दिव्यांगता कभी पैरों की बेड़ी नहीं बन सकती। इसे सच कर दिखाया है बालोद जिला मुख्यालय के जवाहर पारा निवासी रूपेश कुमार सोनकर ने। रूपेश स्वयं दिव्यांग हैं, लेकिन पर्यावरण को सहेजने के उनके हौसले के आगे हर चुनौती बौनी साबित हुई है। पिछले 20 वर्षों से वे बिना किसी सरकारी मदद या एनजीओ के सहयोग के, पूरी तरह नि:शुल्क और नि:स्वार्थ भाव से पर्यावरण संरक्षण की अलख जगा रहे हैं। अब तक वे 10,000 से अधिक पौधे लगा चुके हैं।

​विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) के मौके पर आज पूरा जिला उनके इस ऐतिहासिक और भगीरथ प्रयास को सलाम कर रहा है। क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि रूपेश कुमार सोनकर के इस अनूठे रिकॉर्ड को ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में दर्ज किया जाना चाहिए।

​साइकिल ही है सहारा: घर-घर, दफ्तर और खेतों तक का सफर

​रूपेश पेट्रोल की बढ़ती कीमतों और बढ़ते प्रदूषण के खिलाफ भी एक मौन संदेश देते हैं। वे आज भी साइकिल से ही सफर करते हैं। वे अपनी साइकिल पर पौधे लादकर घर-घर, स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, गांव, शहर और खेत-खलिहानों तक पहुंचते हैं। रूपेश का मानना है कि साइकिल चलाने से न सिर्फ पेट्रोल की बचत और पर्यावरण की सुरक्षा होती है, बल्कि इंसान का स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है।

​कबाड़ को बनाते है गमले और तैयार होते हैं पौधे

​रूपेश की एक और खास बात यह है कि वे पर्यावरण को कचरे से भी बचा रहे हैं। घरों में टूटे-फूटे टब, बाल्टी या घमेले जिन्हें लोग कबाड़ में फेंक देते हैं, रूपेश उन्हें इकट्ठा करते हैं। उनमें मिट्टी भरकर, कली के माध्यम से नए पौधे तैयार करते हैं। जब पौधों में पत्तियां आ जाती हैं, तब वे इन्हें लोगों को उपहार स्वरूप भेंट करने के लिए तैयार करते हैं।

​जन्मदिन और शुभ अवसरों को बनाते हैं ऐतिहासिक

​किसी का जन्मदिन हो, शादी की सालगिरह हो, या फिर शिक्षक दिवस, महिला दिवस, फ्रेंडशिप डे और रक्षाबंधन जैसे खास मौके—रूपेश वहां एक खास मिशन के साथ पहुंचते हैं।

​सुबह का संदेश: जिसका जन्मदिन होता है, उसे रूपेश सुबह ही मोबाइल पर बधाई संदेश भेजते हैं।

​दफ्तर या घर पहुंचकर उपहार: इसके बाद वे खुद उसके घर या कार्यालय जाकर नि:शुल्क एक पौधा और एक उपयोगी उपहार भेंट करते हैं।

​ संकल्प: वे केवल पौधा देते नहीं हैं, बल्कि उसे रोपित करवाकर उसके संरक्षण (लकड़ी का घेरा, तार या जाली लगाना और रोज पानी देना) का संकल्प भी दिलाते हैं।

​स्कूली बच्चों का बढ़ता है मान-सम्मान

रूपेश स्कूलों में जाकर प्रार्थना सभा (असेंबली) के दौरान प्राचार्य और शिक्षकों के हाथों जन्मदिन वाले छात्र-छात्राओं को पौधा और उपहार दिलवाते हैं। इससे बच्चों का मान-सम्मान बढ़ता है और दूसरे बच्चे भी पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित होते हैं।

​नशा मुक्ति का अनूठा संदेश: “शराब की पार्टी छोड़, जन्मदिन पर लगाएं पौधा”

​आजकल युवा पीढ़ी में जन्मदिन पर शराब पार्टी करने का चलन बढ़ा है, जिस पर रूपेश गहरा दुख जताते हैं। उनका आग्रह है कि लोग नशे से दूर रहें और अपने जन्मदिन पर एक पौधा जरूर लगाएं। रूपेश कहते हैं:

​”हमारे देश की आबादी करीब 135 करोड़ से अधिक है। अगर हर नागरिक अपने जन्मदिन पर सिर्फ एक पौधा लगाना और उसे बचाना शुरू कर दे, तो पूरा देश हरियाली से झूम उठेगा और लोग नशे जैसी बुराइयों से भी दूर रहेंगे।”

​बिना किसी मदद के अपनी जेब से करते हैं खर्च

​हैरानी की बात यह है कि पिछले दो दशकों से चल रहे इस महाअभियान के लिए रूपेश को न तो किसी सरकार से मदद मिली है और न ही किसी गैर-सरकारी संगठन (NGO) से। वे अपनी मेहनत की कमाई का हिस्सा इन पौधों और उपहारों पर खर्च करते हैं। रूपेश कहते हैं कि लोगों के चेहरे की खुशी और उनकी तारीफ ही मेरी असली ताकत है, जो मुझे हर दिन कुछ नया करने के लिए उत्साहित करती है।

​बचपन की वो याद आज भी है जिंदा: जानकी साहू

​रूपेश के इस अभियान से लाभान्वित हुई जानकी साहू ने अपनी पुरानी यादें साझा करते हुए बताया:

​”जब मैं कक्षा पांचवीं में पुतली शाला में पढ़ती थी, तब रूपेश भैया ने स्कूल प्रांगण में शिक्षकों के हाथों मुझे एक पौधा और एक मार्कशीट रखने वाली फाइल उपहार में दी थी। वह ऐतिहासिक दिन मुझे आज भी याद है। भैया की दी हुई वह फाइल आज भी मेरे पास सुरक्षित है, जिसमें मैंने अपने सारे ओरिजिनल दस्तावेज संभाल कर रखे हैं। उनका यह कार्य सचमुच वंदनीय है।”

​जनता की मांग: गिनीज बुक में दर्ज हो नाम

​लगातार 20 वर्षों से समाज को नई दिशा दे रहे रूपेश कुमार के इस कार्य को देखते हुए क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों ने लिखित में यह बात कही है कि उनके इस ऐतिहासिक कार्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलनी चाहिए। उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां यह सीख सकें कि एक दिव्यांग व्यक्ति यदि ठान ले, तो वह बिना किसी स्वार्थ के प्रकृति को कितना बड़ा योगदान दे सकता है।

​बदलते मौसम की चेतावनी: 45 डिग्री का टॉर्चर, अब तो जागना होगा

​इस वर्ष बढ़ती भीषण गर्मी का जिक्र करते हुए रूपेश कहते हैं कि देश के कई हिस्सों में तापमान रिकॉर्ड स्तर (45 डिग्री से ऊपर) को छू रहा है। लोग बिना एसी और कूलर के रह नहीं पा रहे हैं। अगर हमें आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित रखना है और गर्मी के दिनों में चैन की सांस लेनी है, तो हमें अपनी सोच बदलनी होगी। कंक्रीट के जंगलों के बीच असली जंगलों को बचाना और नए पौधे लगाना अब हमारी मजबूरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है।

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